Quarterly Exam 2026-27 Class 12th Hindi Kavi Evam Lekhak Parichay || कक्षा 12वीं हिन्दी कवि परिचय त्रैमासिक परीक्षा 2026 एमपी बोर्ड
इकाई 6 - कवि एवं लेखक परिचय
(अ) कवि परिचय
1. हरिवंश राय बच्चन (म.प्र. 2023)
- मधुशाला, मधुबाला, मधुकलश, निशा निमंत्रण, एकांत संगीत आदि।
- हरिवंशराय बच्चन हालावादी कवि हैं। हालावाद के साथ रहस्यवादी भावना का अनूठा एवं अद्भुत संगम उनकी रचनाओं में देखने को मिलता है। उनकी कविताओं में प्रेम और सौन्दर्य, सामाजिक चेतना के भाव मुखरित हैं। हरिवंशराय बच्चन की कविताओं में शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग हुआ है। तत्सम शब्दावली का प्रयोग इनके काव्य में हुआ है। मुख्य रूप से प्रांजल शैली एवं गीति शैली के दर्शन इनके काव्य में होते हैं। इनके काव्य में उपमा, रूपक, यमक, अनुप्रास, श्लेष आदि अनेक अलंकारों का प्रयोग हुआ है।
- हालावाद के प्रवर्तक कवि हरिवंशराय बच्चन शुष्क एवं नीरस विषयों को भी सरस ढंग से प्रस्तुत करने में सिद्धहस्त थे। वे छायावादोत्तर युग के प्रख्यात कवि हैं। हरिवंशराय बच्चन जैसे महान और उच्चकोटि की विचारधारा वाले कवि सदियों में जन्म लेते हैं।
2. आलोक धन्वा
- 'जनता का आदमी', ब्रूनो की बेटियाँ, गोली दागो पोस्टर, भागी हुई लड़कियाँ, कपड़े के जूते आदि।
- आलोक धन्वा एक जनकवि हैं। उनकी कविताओं में नारी विमर्श स्पष्ट दिखता है। वे कविता गढ़ने में सिद्धहस्त हैं। वे साम्राज्यवाद के प्रबल विरोधी रहे हैं। वे बाल मनोविज्ञान के सिद्धहस्त कवि हैं। धन्वा जी राष्ट्रीय चेतना के प्रतिनिधि कवि हैं। आलोक धन्वा ने अपनी रचनाओं में शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग किया है। इनके साहित्य में तत्सम, तद्भव, साधारण बोलचाल के शब्द समाहित हैं। इनकी शैली अभिधात्मक शैली है। प्रसाद गुण एवं माधुर्य गुण का समायोजन सुंदर ढंग से हुआ है। इनके साहित्य में अनुप्रास, यमक, उपमा, रूपक, मानवीकरण आदि अलंकारों का सुंदर समायोजन हुआ है।
- आलोक धन्वा समकालीन काव्यधारा के एक प्रमुख कवि हैं। उनके यहाँ कला और विचार एकमेव हो जाते हैं। उनकी कविताओं में रोशनी से भरी बेहद हल्की भाषा और कलात्मक कुशलता का जैसा रूप दिखाई पड़ता है, वैसा काव्य-कौशल बड़े-बड़े नामचीन साहित्यकारों के साहित्य में भी दिखाई नहीं देता। समकालीन हिन्दी कविता में आपका प्रमुख स्थान है।
3. कुँवर नारायण
- चक्रव्यूह, तीसरा सप्तक, परिवेशः हम तुम, अपने सामने, कोई दूसरा नहीं।
- कुँवर नारायण नागर संवेदना के प्रतिनिधि कवि हैं। कुँवर जी ने अपनी पूरी काव्ययात्रा में मानवीय संबंधों को नई तरह से परिभाषित किया। नव सामाजिक मूल्यों के प्रति उनकी निष्ठा स्पष्ट झलकती है। उन्होंने समय-समय पर सत्ता की राजनीति पर तीक्ष्ण प्रहार किए हैं। कुँवर नारायणजी की भाषा मुख्य रूप से साहित्यिक खड़ी बोली है, जिसमें अंग्रेजी, उर्दू, फारसी, तत्सम और तद्भव शब्दावली का प्रयोग किया है। प्रतीकात्मकता इनकी शैली की विशेषता है। इन्होंने अपने काव्य में उपमा, रूपक, अनुप्रास, यमक, पदमैत्री आदि अलंकारों का प्रयोग किया है। इन्होंने अपने काव्य में मुक्तक छंद का प्रयोग किया है।
- कुँवर नारायण जी की प्रतिष्ठा और आदर हिन्दी साहित्य जगत में सर्वमान्य है। उनकी ख्याति मात्र एक लेखक की तरह ही नहीं, बल्कि कला की अनेक विधाओं में गहरी रुचि रखने वाले रसिक विचारक के समान थी। उनके द्वारा रचे गए काव्य हिन्दी साहित्य की अनमोल विरासत है।
4. रघुवीर सहाय (म.प्र. 2022)
- सीढ़ियों पर धूप, आत्महत्या के विरुद्ध, हँसो-हँसो जल्दी हँसो, लोग भूल गए हैं, एक समय था।
- रघुवीर सहाय ने समकालीन समाज का यथार्थ चित्रण किया है। इन्होंने मध्यमवर्गीय जीवन का चित्रण अपने काव्य में किया है। इन्होंने अपने काव्य में सामाजिक व्यवस्था, शोषण, विडम्बना आदि का यथार्थ चित्रण किया है। रघुवीर सहाय जी की भाषा शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली है इसमें संस्कृत के तत्सम शब्द, तद्भव और विदेशी भाषा के शब्दों का समायोजन किया है। इन्होंने अपने काव्य में व्यंग्यात्मक शैली का प्रयोग किया है। इनके काव्य में अनुप्रास, उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा आदि अलंकारों का प्रयोग हुआ है। रघुवीर सहाय की रचनाओं में मुक्तक छंदों का प्रयोग किया गया है।
- रघुवीर सहाय एक लम्बे समय तक याद रखे जाने वाले कवि हैं। सहाय जी राजनीति पर कटाक्ष करने वाले कवि है। मूलतः उनकी कविता में पत्रकारिता के तेवर और अखबारी अनुभव दिखाई देता है। हिन्दी साहित्य में उनका योगदान अविस्मरणीय है।
5. शमशेर बहादुर सिंह
- कुछ कविताएँ, कुछ और कविताएँ, चुका भी हूँ नहीं मैं, इतने पास अपने, बात बोलेगी।
- शमशेर बहादुर सिंह प्रेम और सौन्दर्य के कवि हैं। उनकी कविताओं में जीवन के राग-विराग का सजीव चित्रण हुआ है। वे प्रकृति के चितेरे कवि हैं। उनकी लेखनी के जादू से प्रकृति का सजीव वर्णन हुआ है। उन्होंने समकालीन समाज में फैली दरिद्रता का सजीव चित्रण किया है। शमशेर बहादुर सिंह अपने राष्ट्रीय कर्त्तव्यों के प्रति सचेत कवि थे। उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से लोगों से राष्ट्र-सेवा, स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए एकजुट रहने एवं राष्ट्र के लिए सर्वोच्च बलिदान देने का आह्वान किया है। शमशेर बहादुर सिंह की भाषा सरल, सुबोध, साहित्यिक खड़ी बोली है जिसमें तत्सम, तद्भव, अंग्रेजी, उर्दू, फारसी आदि भाषाओं की शब्दावली का प्रयोग हुआ है। कविताओं में मुहावरों का प्रयोग हुआ है। वर्णनात्मक एवं चित्रात्मक शैली का प्रयोग इनकी कविताओं में हुआ है। इनकी रचनाओं में मुख्य रूप से अनुप्रास, यमक, श्लेष, पदमैत्री, मानवीकरण, रूपक उत्प्रेक्षा अलंकार का प्रयोग हुआ है। इनकी रचनाओं में मुक्तक छंद का प्रयोग सफलतापूर्वक हुआ है।
- प्रयोगवाद और नई कविता के कवियों में शमशेर बहादुर सिंह अग्रणी हैं। हिन्दी के नए कवियों में उनका नाम अग्रणी है। इन्होंने छायावादोत्तर काव्य को एक प्रभावी गति प्रदान की। हिन्दी साहित्य में इनको एक अति विशिष्ट स्थान प्राप्त है।
6. सूर्यकांत त्रिपाठी निराला
- परिमल, गीतिका, अनामिका, बेला, नए पत्ते, तुलसीदास, कुकुरमुत्ता, सरोज स्मृति, राम की शक्ति पूजा, आराधना आदि।
- छायावाद के उन्नायक कवि होने के कारण निराला के काव्य में प्रेम तथा सौन्दर्य के मोहक चित्र प्राप्त होते हैं। उनका सौन्दर्य चित्रण आकर्षक एवं अद्भुत है। उनके काव्य में भक्ति एवं रहस्य भावनापरक रचनाएँ भी प्राप्त होती हैं। उन्होंने आत्मा तथा परमात्मा की एकता का प्रतिपादन किया है। निराला जी के काव्य में प्रकृति चित्रण के विविध रूप प्राप्त होते हैं। उनका प्रकृति चित्रण अत्यन्त मधुर और सजीव है। उनका काव्य देश-प्रेम और राष्ट्रीयता की भावनाओं से ओतप्रोत है। उनके काव्य में प्रगतिवादी विचारधारा के दर्शन होते हैं। निराला जी की भाषा भावों के अनुरूप है, उनकी भाषा सरल एवं व्यावहारिक है भाषा में उर्दू, फारसी एवं बंगला शब्द भी प्रयुक्त हुए हैं। उनकी शैली सरल, प्रवाहपूर्ण, व्यंग्यपूर्ण एवं चुटीली है। उन्होंने अपने काव्य में उपमा, उत्प्रेक्षा, रूपक मानवीकरण आदि अलंकारों का प्रयोग किया है। निराला जी मुक्त छंद के प्रवर्तक माने जाते हैं।
- आधुनिक कवियों में निराला का उत्कृष्ट स्थान है। वे मुक्तक के जनक थे। उन्होंने हिन्दी कविता को नई दिशा प्रदान की। हिन्दी साहित्य में निराला के कृतित्व को उनके व्यक्तित्व में और भी अधिक महान बनाया है। निराला जी हिन्दी के मूर्धन्य रचनाकार हैं।
7. तुलसीदास जी (म.प्र. 2022, 23)
- रामचरितमानस, कवितावली, गीतावली, दोहावली, विनयपत्रिका, पार्वती मंगल, जानकी मंगल, रामलला नहछू।
- तुलसीदास रामभक्ति शाखा के प्रमुख कवि थे। तुलसीदास जी का दृष्टिकोण अत्यन्त व्यापक एवं समन्वयवादी था। वे तत्कालीन समाज में भक्त कवि के साथ-साथ समाज सुधारक भी माने गए। लोकमंगल की भावना तुलसी के काव्य का आधार है। उनकी भक्ति दास्य भक्ति है। उनके आराध्य मंगल भवन अमंगलहारी हैं। शबरी, गिद्ध, अजामिल आदि सबको मुक्ति प्रदान करने वाले भगवान राम लोक कल्याणकारी हैं। उन्होंने रामजी के शील, सौन्दर्य और शक्ति का वर्णन किया है। तुलसीदास जी ने अवधी एवं ब्रजभाषा में काव्य रचना की है। उनकी दोहा-चौपाई शैली प्रमुख है। उनके काव्य में उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, सन्देह, भ्रान्तिमान आदि अलंकारों का समुचित प्रयोग हुआ है। उन्होंने तत्कालीन सभी छंदों का प्रयोग किया है, उनमें दोहा, चौपाई, सोरठा, कवित्त, सवैया आदि छंदों का प्रमुख रूप से प्रयोग किया है। उनके काव्य में शांत रस, श्रृंगार रस आदि का प्रमुख रूप से प्रयोग हुआ है।
- गोस्वामी तुलसीदास लोक कवि हैं। उनके काव्य से जीने की कला सीखी जा सकती है। उनके लिए 'सूर-सूर तुलसी ससि' कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है। तुलसीदास वास्तव में जननायक थे। यद्यपि उन्होंने 'स्वान्तः सुखाय' काव्य की रचना की है।
8. फ़िराक गोरखपुरी
- गुले-नगमा, बज्मे-जिन्दगी, रंगे-शायरी, उर्दू गज़ल गोई, गुले-रअना, रुहे-कायनात, मशऊल, सरगम, तराने-इश्क आदि।
- फ़िराक गोरखपुरी सौन्दर्य बोध के शायर हैं और यह भाव गज़ल और रुबाई दोनों में बराबर व्यक्त हुआ है। दैनिक जीवन के कड़वे सच और आने वाले कल के प्रति उम्मीद, दोनों को भारतीय संस्कृति और लोकभाषा के प्रतीकों से जोड़कर फ़िराक ने अपनी शायरी का अनूठा महल खड़ा किया। गोरखपुरी की रचनाओं में उनका प्रकृति प्रेम स्पष्ट झलकता है। फ़िराक गोरखपुरी मूल रूप से उर्दू के शायर (कवि) हैं। इन्होंने अपनी रचनाओं में उर्दू, फारसी, साधारण बोलचाल, हिन्दी की खड़ी बोली की शब्दावली का प्रयोग किया है। उर्दू में शेर लिखे नहीं कहे जाते हैं। इन्होंने अनुप्रास, उपमा, उत्प्रेक्षा, मानवीकरण, सन्देह आदि अलंकारों का प्रयोग किया है। इन्होंने अपनी रचनाओं में उर्दू के प्रचलित सभी छंद-रुबाई, गज़ल, नज़्म आदि का प्रयोग किया है।
- फ़िराक गोरखपुरी उर्दू नक्षत्र का वह जगमगाता सितारा है जिसकी रोशनी आज भी शायरी को एक नया आयाम प्रदान कर रही है। इस अलमस्त शायर की शायरी की गूँज आज भी काव्य-रसिकों के हृदय में गूँजती है। उर्दू-साहित्य में उनका स्थान अत्यन्त उच्चकोटि का है।
9. उमाशंकर जोशी
- सापनाभारा, विश्वशांति, गंगोत्री, निशीथ, प्राचीना, अभिज्ञा, शहीद, श्रावणी मेणो, विसामों।
- उमाशंकर जोशी प्रकृति के चितेरे कवि हैं। उनके काव्य में राष्ट्रभक्ति की भावना भरी हुई है। उन्होंने स्वयं स्वतंत्रता आन्दोलन में भाग लिया और कई बार जेल गए। जोशी जी के साहित्य में गुजराती भाषा की प्रादेशिकता की स्पष्ट झलक देखने को मिलती है। गुजरात प्रान्त का रहन-सहन, खान-पान, रीति-रिवाज, संस्कारों आदि का वर्णन उनकी कृतियों में सजीव हो उठा है। उनके साहित्य में मानवतावाद की झलक स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। उमाशंकर जोशी जी मूलतः गुजराती भाषा के कवि हैं। इनके काव्य में खड़ी बोली की प्रधानता है जिसमें तत्सम, तद्भव शब्दों का सहज समन्वित प्रयोग किया गया है। प्रतीकात्मक शैली, कवित्त शैली का प्रयोग इनके काव्य में हुआ है। चित्रात्मक एवं वर्णनात्मक शैली का प्रयोग उनके काव्य में प्रकट होता है। इनके काव्य में अनुप्रास, उपमा, पदमैत्री आदि अलंकारों का प्रयोग हुआ है। कविताओं में मुक्तक छंद का प्रयोग देखने को मिलता है।
- उमाशंकर जोशी का आगमन गुजराती साहित्य की ही नहीं अपितु भारतीय साहित्य की भी एक महत्त्वपूर्ण घटना मानी जाती है। हिन्दी साहित्य के सुदीर्घ समय पट पर, इतना स्वस्थ, रंगीन वैविध्यपूर्ण स्वर आधुनिक गुजराती कविता के इतिहास में और सम्भवतया भारतीय इतिहास में भी बहुत कम कवियों का सुनाई दिया है। आधुनिक और गाँधीयुग के साहित्यकारों में उनका शीर्ष स्थान है।
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