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Ras Ki Paribhasha Evam Ras Ke Samasta Udahran - रस प्रकरण, रस की परिभाषा एवं उदाहरण, विभाव अनुभाव, संचारी भाव, स्थाई भाव

रस: परिभाषा, अंग, निष्पत्ति एवं सभी रसों के उदाहरण | Mains Education

हिंदी साहित्य: रस (परिभाषा, अंग, निष्पत्ति एवं उदाहरण)

प्रतियोगी परीक्षाओं (UPSC, State PSC, MPPSC, REET, CTET) हेतु महत्वपूर्ण अध्ययन सामग्री — Mains Education

1. रस की परिभाषा (Definition of Ras)

काव्य को पढ़ने, सुनने या नाटक को देखने से पाठक, श्रोता या दर्शक को जिस अलौकिक आनंद की प्राप्ति होती है, उसे रस कहते हैं। हिंदी साहित्य और काव्य शास्त्र में रस को "काव्य की आत्मा" माना गया है।

आचार्य विश्वनाथ के अनुसार: "वाक्यं रसात्मकं काव्यम्" अर्थात रसयुक्त वाक्य ही काव्य है।

2. रस निष्पत्ति (Ras Nishpatti)

रस निष्पत्ति का सिद्धांत सबसे पहले भरत मुनि ने अपने ग्रंथ 'नाट्यशास्त्र' में दिया था। उन्होंने रस निष्पत्ति का प्रसिद्ध सूत्र प्रतिपादित किया:

रस सूत्र: "विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः"
अर्थ: विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी (संचारी) भावों के संयोग से रस की निष्पत्ति (उत्पत्ति) होती है।

3. रस के अंग (Elements of Ras)

रस के मुख्य रूप से चार अंग होते हैं:

1. स्थायी भाव (St投影hai Bhav)

जो भाव मनुष्य के हृदय में हमेशा सुप्त अवस्था में विद्यमान रहते हैं और उचित अवसर आने पर जाग्रत होते हैं, उन्हें 'स्थायी भाव' कहते हैं। इनकी मूल संख्या 9 मानी गई है (बाद में वात्सल्य और भक्ति को जोड़कर 11 हुई)।

2. विभाव (Vibhav)

स्थायी भावों को जगाने या उद्दीप्त करने वाले कारक या कारण 'विभाव' कहलाते हैं। विभाव दो प्रकार के होते हैं:

  • आलंबन विभाव: जिसके कारण भाव जागे (जैसे: नायक, नायिका, चोर, शेर)।
  • उद्दीपन विभाव: जो जगे हुए भाव को और तीव्र करे (जैसे: एकांत स्थान, प्राकृतिक दृश्य, चांदनी रात)।

3. अनुभाव (Anubhav)

आश्रय की बाह्य शारीरिक चेष्टाओं को 'अनुभाव' कहते हैं (जैसे: भय से कांपना, रोना, पसीना आना)। इसके चार भेद होते हैं: कायिक, मानसिक, आहार्य, और सात्विक।

4. संचारी या व्यभिचारी भाव (Sanchari Bhav)

जो भाव मन में पानी के बुलबुलों की तरह उठते और विलीन होते रहते हैं, उन्हें संचारी भाव कहते हैं। इनकी कुल संख्या 33 मानी गई है (जैसे: चिंता, हर्ष, मोह, गर्व आदि)।

4. रस तथा उनके स्थायी भाव की सारणी

क्र.सं. रस का नाम स्थायी भाव
1शृंगार रसरति (प्रेम)
2करुण रसशोक
3वीर रसउत्साह
4हास्य रसहास (हंसी)
5रौद्र रसक्रोध
6भयानक रसभय
7बीभत्स रसजुगुप्सा (घृणा)
8अद्भुत रसविस्मय (आश्चर्य)
9शांत रसनिर्वेद (वैराग्य)
10वात्सल्य रसवत्सलता (संतान प्रेम)
11भक्ति रसभगवद्विषयक रति (देव प्रेम)

5. सभी रसों की परिभाषा, पहचान एवं उदाहरण

1. शृंगार रस (Shringar Ras)

परिभाषा: जहाँ नायक और नायिका के प्रेम, सौंदर्य तथा मिलन या विरह का वर्णन होता है, वहाँ शृंगार रस होता है। इसे 'रसराज' (रसों का राजा) भी कहा जाता है। (इसके दो भेद हैं: संयोग और वियोग)।

पहचान: रति भाव, नायक-नायिका का वर्णन, एकांत, सौंदर्य।

उदाहरण:
"बतरस लालच लाल की मुरली धरी लुकाय।
सौंह करे भौंहनि हँसै, दैन कहे नट जाय॥"

2. वीर रस (Veer Ras)

परिभाषा: युद्ध, धर्म, दान या दया के क्षेत्र में कठिन कार्य करने के लिए हृदय में जो 'उत्साह' का भाव जाग्रत होता है, वहाँ वीर रस होता है।

पहचान: उत्साह, वीरता, शत्रु का ललकारना, देशप्रेम।

उदाहरण:
"बुंदेले हरबोलो के मुख हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥"

3. करुण रस (Karun Ras)

परिभाषा: किसी प्रिय वस्तु, व्यक्ति के विनाश, हानि या वियोग के कारण हृदय में उत्पन्न 'शोक' नामक स्थायी भाव से करुण रस की निष्पत्ति होती है।

पहचान: शोक, दुख, रोना-धोना, आंसुओं का बहना।

उदाहरण:
"दुख ही जीवन की कथा रही,
क्या कहूँ आज जो नहीं कही।"

4. हास्य रस (Hasya Ras)

परिभाषा: किसी व्यक्ति की विचित्र वेशभूषा, वाणी, चेष्टा या आकार को देखकर हृदय में जो 'हास' (हंसी) का भाव उत्पन्न होता है, वहाँ हास्य रस होता है।

पहचान: हंसी, विचित्रता, व्यंग्य।

उदाहरण:
"तंबूरा ले मंच पर बैठे प्रेमप्रताप,
साज मिले पंद्रह मिनट, घंटा भर आलाप।
घंटा भर आलाप, राग में मारा गोता,
धीरे-धीरे खिसक चुके थे सारे श्रोता॥"

5. रौद्र रस (Raudra Ras)

परिभाषा: जब किसी विरोधी, शत्रु या अनुचित कार्य करने वाले व्यक्ति द्वारा किए गए अपमान के कारण मन में 'क्रोध' उत्पन्न होता है, तो वहाँ रौद्र रस होता है।

पहचान: क्रोध, लाल आँखें, दांत पीसना, गर्जना।

उदाहरण:
"श्रीकृष्ण के सुन वचन अर्जुन क्रोध से जलने लगे।
सब शोक अपना भूल कर करतल युगल मलने लगे॥"

6. भयानक रस (Bhayanak Ras)

परिभाषा: किसी भयानक वस्तु, भयप्रद परिस्थिति या शक्तिशाली शत्रु को देखने-सुनने से मन में जो 'भय' उपजा है, उससे भयानक रस बनता है।

पहचान: भय, कांपना, पसीना छूटना, चीखना।

उदाहरण:
"एक ओर अजगरहिं लखि, एक ओर मृगराय।
विकल बटोही बीच ही, परयो मूरछा खाय॥"

7. बीभत्स रस (Bibhatsa Ras)

परिभाषा: घृणित वस्तुओं, सड़ी-गली चीजों, या शवों को देखकर मन में उत्पन्न होने वाली 'जुगुप्सा' (घृणा) से बीभत्स रस की निष्पत्ति होती है।

पहचान: घृणा, दुर्गंध, मांस-रक्त का वर्णन, थूकना।

उदाहरण:
"सिर पर बैठ्यो काग आँख दोऊ खात खींचत।
जीहिहिं स्यार अति आनंद उर धारत॥"

8. अद्भुत रस (Adbhut Ras)

परिभाषा: किसी अलौकिक, विचित्र या आश्चर्यजनक वस्तु/घटना को देखकर मन में उपजे 'विस्मय' (आश्चर्य) से अद्भुत रस निष्पन्न होता है।

पहचान: आश्चर्य, विस्मय, स्तब्ध रह जाना।

उदाहरण:
"देखि यशोदा शिशु के मुख में, सकल विश्व की माया।
क्षण भर को वह बनी अचेतन, हिल न सकी तन काया॥"

9. शांत रस (Shant Ras)

परिभाषा: संसार की नश्वरता, ईश्वर भक्ति और मोक्ष का ज्ञान होने पर मन में 'निर्वेद' (वैराग्य) का भाव जगता है, वहाँ शांत रस होता है।

पहचान: शांति, वैराग्य, ईश्वर भक्ति, नश्वरता का अहसास।

उदाहरण:
"मन रे तन कागद का पुतला।
लागे बूँद बिनसि जाय छिन में, गरब करे क्या इतना॥"

10. वात्सल्य रस (Vatsalya Ras)

परिभाषा: माता-पिता का बच्चे के प्रति स्नेह, बाल-लीलाओं और संतानों के प्रति प्रेम से जो 'वत्सलता' जाग्रत होती है, उसे वात्सल्य रस कहते हैं।

पहचान: बालक का सौंदर्य, तोतली बोली, माता-पिता का स्नेह।

उदाहरण:
"यशोदा हरि पालने झुलावै।
हलरावै दुलराइ मल्हावै जोइ सोइ कछु गावै॥"

11. भक्ति रस (Bhakti Ras)

परिभाषा: ईश्वर के प्रति परम प्रेम, अनुराग और समर्पण के भाव को 'भक्ति रस' कहा जाता है। इसका स्थायी भाव 'भगवद्विषयक रति' है।

पहचान: ईश्वर के नाम का संकीर्तन, पूर्ण आत्मसमर्पण।

उदाहरण:
"मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई।
जाके सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई॥"

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